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Monday, 24 November 2014

हम तुम्हे बहुत याद करते हैं 

हम तुम्हे बहुत याद करते हैं
जाने कहाँ गुम  गई हो
हम फ़रियाद करते हैं
हम तुम्हे बहुत याद करते हैं

देर तक अलसाये न बिस्तर को कहना अलविदा
मासूमियत का दौर , मीठी झिड़कियों का काफिला
उस वक़्त जब हम सिर्फ ठन्डे पानी से डरते थे
उस सुबह और उन नखरों पे मरते हैं
हम तुम्हे बहुत याद करते हैं

धूल में अब कपड़े नहीं सनते ,
मीठी गोली पे मन नहीं मचलते
कीचड़ को पानी से धो पाते थे
अब लोगों की नज़रो से बचने का जतन करते हैं
हम तुम्हे बहुत याद करते हैं 

Tuesday, 21 October 2014

बदली है तो बस .....

गाँव तो हर कहीं के एक से हैं ,
एक सी मुस्कान , एक सा मुक़ाम
'ग़र बदली है तो बस ...
इंसान की सूरत ,
दिलों की फ़ितरत ,
राह के सन्नाटे ,
घी के बने परांठे ,
फूँस की छत ,
और अडान से झाँकने वाली
गौरैय्या के घौंसले की लत !

पंछियों के जागने का समय
सब जगह एक सा है ..
खेतों की रंगत पर भी
शक़ नहीं मुझको ...
बदली है तो बस ,
धरती के सीने पे उकेरी लकीर ,
कभी अनाज माँगने वाला फ़कीर ,
बैलों के घंटे की आवाज़ ,
मिट्टी को पसीने से सींचता जाबाज़ ,
शिकायतों का अपनापन ...
बुढापों में मौजूद बचपन !

बस जो बदली है ,
वो रूह की पहचान है ...
कहने को अब भी हम इंसान हैं
बाकी सब एक सा है ,
वही है....
जैसे चमकता , लीपा-पुता
सीना फुलाए खड़ा
अपनी ही तन्हाई से जूझता ..
एक ख़ाली मकान है !!

Saturday, 20 September 2014

इस तरह (sleepless saturday #1)

आँख तले चांदना किया
बदस्तूर चिराग जलाए रक्खा 
इस तरह, इंतज़ार में रात को जगाया मैंने 

बेज़ार लगता है कहना 
और ख्यालो को बेपर्दा करना 
इस तरह, तुम्हें कलम में छुपाया मैंने 







Thursday, 24 July 2014

... तो फ़र्क पड़ता




मेरे चेहरे के उजाले क्यूँ तुमको बुलाते हैं ?
कभी मेरे मन का अँधेरा रिझाये तो फ़र्क पड़ता..


यूँ उगते हुए सूरज को निहारा सबने ..
कभी छिपते को सर झुकाते तो फ़र्क पड़ता..


तुम्हारे दिन ने अनेक चेहरो पे मुस्कान देखी है
कभी इस रात में सिलवटें गिन पाते तो फ़र्क पड़ता..


दोस्ती दर्द दरियादिली सभी देखा हमने
महसूस न हो जब कुछ,तब आह सुन जाते तो फ़र्क पड़ता..


राहें महकती थी, बागों में जब बहारें बिखरी थीं
पतझड़ में कोई तितली ही मानते तो फ़र्क पड़ता..


मेरी मुस्कान ठगती है दुनिया भर क चोचले..
लबों में दबी शिकायतों को सिल पाते तो फ़र्क पड़ता..


मुझे अब फ़र्क नहीं पड़ता , इसके आने उसके जाने से
'गर ठहाकों में ना गुम जाती हिचकियाँ तो फ़र्क पड़ता..

ज़िन्दगी






एक ज़िन्दगी बिखरी पड़ी है हर कदम पर,
हम चले जा रहे हैं बेखबर

झूठ मूठ के चोचले
ना तेरे, ना मेरे घोंसले.. 

किस तरह एक ज़िन्दगी ज़ाया किये दे रहे हैं !!

Monday, 7 October 2013

वो





वो भी जिसपे बस चलता है , बस उसी पे चला कर खुश है
रात को दिन, दिन को रात बना कर खुश है
मूर्तियों में पाँव पसार बैठा है शायद
मन के सूखे फूल में पर खुशबू है नदारद
उलझती सुलझती राह में साथ देने तो आ
कभी साथ मेरे मुस्कुराने तो आ

कच्चे पक्के से, सपने थे सादे
फिर बड़-बोले गीतों में याद करने के वादे
मुझे फिर अपने होने पर ही शक हो गया
मेरा तो होना ही ज़र्रे भर भी नहीं
मुझको बस तू है , तुझको बस मैं ही तो नहीं

अध-खुले रोशनदान से छन कर आती रोशिनी में
महसूस तो किया तुझको
निहारना भर दूभर था उस नरम किरण को
इस तरह तेरी असीम ताकत का अंदाज़ा लगाया मैंने
आँख की पुतली में आ कर चिपक गया चौन्धियारा
अब चाहे बंद हो या खुली पलकें , मुझे तेरा रोशनारा

तुझ तक कभी तो पहुँच जाऊँगी मैं भी
बेपरवाह सी रात बिताउंगी मैं भी
मेरे एक कनेर के फूल पर तू गौर फरमाएगा
मेरा गीत फिर होगा जग-ज़ाहिर
फिर यूँ ही खुश हुई, की कभी तो सुनेगा ही..
सबकी सुनता है आखिर !! 

Wednesday, 31 July 2013

बूंदे









कांच पर खरौंदे बनती बूँदें
हर बार की कोशिश , बार बार की कोशिश
फिसलती, संभलती
यहाँ - वहाँ भागती ,
फिर उस पार से झाँकती ,
बदहवास बूँदें ।।



बेपहरी नींद से जागती बूँदें ,
खुदी में मेरे अक्स को बांधती बूँदें
हिल मिल कर सफ़र नापती बूँदें ,
टपक कर आसरे से ख़ाक में दफ़न होना है
ये नायाब बसीरत बाँटती बूँदें ।।