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Friday, 17 February 2017

तेरी नज़र की कलम


तेरी नज़र की कलम अब वो नज़्म नहीं लिखती

जिसके हर मोड़-मिसरे पे कभी मेरा ठिकाना था


सच है , कागज़ की कश्ती की उम्र बहुत नहीं होती

पर दिल के सुकून का ये मश्ग़ला पुश्तों पुराना था


सफ़ेद चादर की दीवारों में मैंने खुद को खोया था

मेरी कलम में उतर आएगा ये जो भी फ़साना था


इस जहाँ से उस जहाँ को जोड़ती हैं बस साँसें

जो साँसों तक सिमटे , क्या इश्क़ फरमाना था  ?


अभी तू खुश हो जा कातिल , चेहरे को रौनक दे !

तेरे इस बेकदर कहर का भी अंजाम आना था


बहुत मिल जाएंगे मुझे तुझसे , तुझे मुझसे लेकिन

मुझे तुझसा , यूँ मिल के भूलने का , हुनर कमाना था


नहीं कोई कहानी है , तेरे मेरे हिस्से आई

पर लगता है की जैसे कोई एक पूरा ज़माना था  


मुझे यादों से यूँ तो कोई ज़्यादती नहीं तकलीफ

पर जैसे जान पे बनी थी, इनका आ कर न जाना था  ||


-अनुष्का 

Thursday, 24 July 2014

... तो फ़र्क पड़ता




मेरे चेहरे के उजाले क्यूँ तुमको बुलाते हैं ?
कभी मेरे मन का अँधेरा रिझाये तो फ़र्क पड़ता..


यूँ उगते हुए सूरज को निहारा सबने ..
कभी छिपते को सर झुकाते तो फ़र्क पड़ता..


तुम्हारे दिन ने अनेक चेहरो पे मुस्कान देखी है
कभी इस रात में सिलवटें गिन पाते तो फ़र्क पड़ता..


दोस्ती दर्द दरियादिली सभी देखा हमने
महसूस न हो जब कुछ,तब आह सुन जाते तो फ़र्क पड़ता..


राहें महकती थी, बागों में जब बहारें बिखरी थीं
पतझड़ में कोई तितली ही मानते तो फ़र्क पड़ता..


मेरी मुस्कान ठगती है दुनिया भर क चोचले..
लबों में दबी शिकायतों को सिल पाते तो फ़र्क पड़ता..


मुझे अब फ़र्क नहीं पड़ता , इसके आने उसके जाने से
'गर ठहाकों में ना गुम जाती हिचकियाँ तो फ़र्क पड़ता..

Wednesday, 2 July 2014

कुछ मसले....

कुछ मसले तुझसे कहने के
कुछ मसले बस चुप रहने के ।


कुछ मसले पल भर की मुस्कान
कुछ मसले बस जैसे पहचान ।


कुछ मसले उम्मीदों के घर
कुछ मसले मायुसी के मंज़र ।


कुछ मसले इंतज़ार की आड़
कुछ मसले हैं नखरों की बाढ़ ।


कुछ मसले पानी का ज़र्रा
कुछ मसले आसमान गहरा ।


कुछ मसले लत्ते कपड़े की फ़िक्र
कुछ मसले हैं बंगलों का ज़िक्र ।


कुछ मसले आंखों का पानी
कुछ मसले हँसी है रूमानी ।


कुछ मसले नज़दीकी के घर
कुछ मसले दूरी के क़हर ।


कुछ मसले "उसकी"  टेढ़ी नज़र
कुछ मसले हालातों के सर ।


कुछ मसले हैं हल के नज़दीक
कुछ मसले माँगे खात्मे की भीख ।


कुछ मसले आंखों की ज़ुबान
कुछ मसले माँगे खुद का बखान ।


कुछ मसले परिन्दों की वापसी
कुछ मसले विदेश की छाप सी ।


कुछ मसले खोजें कॉफ़ी की मेज़
कुछ मसले वक्त से भी तेज़ ।


कुछ मसले तेरी राह ताकते
कुछ मसले बस एक बोल को झांकते ।


कुछ मसले बिन कहे भी समझो
कुछ मसले.. अबके न जल के बुझो । ।