Saturday, 2 July 2022

लखनऊ

 नाज़-ओ-नज़ाकत का शहर .. 

जानी पहचानी लगती ये पहर 

किसी के कदमों की आहट की है ताल 

कोई दिल का हिस्सा है बेहाल 

"हम" "आप" , "मान जाइये" , "आप बताइये"

लहज़ों की मिठास , कैसे भुलाइये ! 

गोमती की लहरें , धागों की कढ़ाई .. 

धागों से जुड़े दिल , फिर कैसी है लड़ाई ! 

लिबास है सादा , जूती है जड़ाऊ 

इश्क़ की तासीर सा , शहर है लखनऊ ❤️



Thursday, 8 October 2020

हम

दो अलग अलग रंग रूप के कप , 

हर शाम की एक चाय 

साथ में पीते हैं 

कुछ यहाँ वहाँ की हाँकते हैं ..

एक दूसरे की ज़द में 

मुसलसल ही झाँकते हैं 

कुछ मसलों पर एक सी आह भरें

कुछ पर खनक भी जाते हैं .. 

फिर एक ही ट्रे में हो कर सवार 

सब रंज-शिकायतों के धब्बे 

सिंक में बहा आते हैं .. 

दोनों की अपनी दास्तान 

दोनों का अन्दाज़ निराला है 

जैसे ये साथ निभाने का 

वादा सा कर डाला है 

क्या इन्हें देख कर तुमको 

“हम” याद नहीं आते ?




Tuesday, 29 October 2019

जब मन की मिट्टी गीली हो

जब मन की मिट्टी गीली हो 
रंग रोशिनी पिरो दीजिए 
फिर रात हो कितनी भी गहरी 
अँधेरा न हो पाएगा 

जो सीख गऐ फाँद जाना 
कोई भी गड्ढा , गहरा - मैला 
तो पकी चिकनी सड़कों का मोह 
न तुमको कभी सताएगा 


ये शनासाई की उम्मीदें 
मरासिमों के कंधो का सुकूत
फिर मानूस ख़ंजर ऐसे भी 
न सम्भला तो मर जाएगा 
(शनासाई - acquaintance 
मरासिम - relations
सुकूत-silence, peace
मानूस -associated, familiar, intimate, friendly)

जब उम्र यूँ बढ़ती जाएगी 
और साल गुज़रते जाएँगे 
अपने पैरों में दम रखना 
कोई हाथ पकड़ न चलाएगा 


रस्ते तो मुश्किल होते ही हैं 
रस्ते में कब तक और रहें
रस्ता जहाँ पे ख़त्म हुआ 

तो लौट के घर ही आएगा 

Monday, 7 January 2019

जाने क्या मरहले...

जाने क्या मरहले दिल को दिखला रहे हैं हम 
तुम्हारे दिए हुए तोते से दिल बहला रहे हैं हम 
(मरहले - stage ) 

मज़ा क्या है बेतकल्लुफ़ी का , क्या बतलाएँ
इश्क़ में कैसे बद-नीयत होते जा रहे हैं हम 

कल रात देखा ख़्वाब , असल में , थी दिलजोई
कि तेरे सीने से लग के शेर बुने जा रहे हैं हम 
(दिलजोई - solacing) 

जो यहाँ दिखता है , दिखता होगा तेरे सर भी 
चाँद की वहीद क़िस्मत पे जल भुने जा रहे हैं हम 
(वहीद - unique , exclusive ) 

किसने देखी दूसरी दुनिया , सभी वाहिमे हैं 

सो इसी दुनिया में कुछ उसूल तोड़े जा रहे हैं हम 

Saturday, 4 November 2017

गुब्बारे




जो फूँक लगे तो फूल के कुप्पा हो जाते थे
हमको छुप्पन छुप्पा का खेल भुलाते थे
तिफ़्ल हसरतों के पंख बन उग आते थे
कम पैसों में आते थे , अब्बा की जेब को भाते थे
रंग बिरंगे पर सादा से , बस मुस्काते थे
मरते मरते बस एक ज़ोर की आवाज़ लगाते थे
कभी कभी तो पानी और रंग भी बरसाते थे
मेरे बचपन वाले तो बस प्यार सिखाते थे
मैं बस दूर से निहारती थी , वो मुझे बुलाते थे
छोटे की माउज़र गन की ख़ातिर, हम उनसे नज़र चुराते थे
मानो जैसे जीते जागते हँसी के फुव्वारे थे
बस ऊपर को ही उड़ना सिखाते गुब्बारे थे ...


Wednesday, 4 October 2017

काश की मैं दोषी



काश की मैं दोषी 
और तुम ख़ुदा रहते 
इस कहानी में तुम 
हर इल्ज़ाम से जुदा रहते 
इससे अच्छा तो वो 
नासमझी का दौर ही था 
मैं अपने नसीब पे 
ख़ूब इतराया करती थी 
ख़्वाबीदा , बेहोश 
काशाने सजाया करती थी 
हक़्क़-आशना की लेहरें 
उजाड़ कर गई हैं 
मुझे तख़्त से उतार के 
बेज़ार कर गई हैं 
कुछ नया नहीं 
सब लम्हे फ़सुर्दा रहते 
मेरे आज कल सब 
तुम्हारे सपुर्दा रहते 
मैं टूटा सफीना 
तुम नाख़ुदा रहते 
काश ! की मैं दोषी 
तुम ख़ुदा रहते 

(काशाने - dwelling 
हक्क़ -आशना— knowing the truth 
सफ़ीना - boat
नाख़ुदा - sailor ) 

Wednesday, 2 August 2017

जैसे एक ही पल में

जैसे एक ही पल में सब समझने लगी हूँ....

रस्म-ओ-रिवाज़ , दुनिया-दारी
आखिर एक लड़ाई मैंने भी हारी

बोलने से पहले बहुत सोचने लगी हूँ
जाने कितनी रातें बेचैनी में जगी हूँ

पहले का हर ग़म तिफ़्ल सा जान पड़ता है
मेरा गुस्सा अब हर बात पे ज़िम्मेदारी से लड़ता है

ज़ेहन अब शाबाशी की राह नहीं ताकता
मेरी निसाबों से तेरा वज़ूद है झांकता

तेशा की नोक पे है ज़माने का इन्साफ
अब "बिन माँ के बच्चों" की गलतियां की जाएंगी माफ़ !

जाने कितने मश्वरों के क़र्ज़ भरने होंगे !
लफ्ज़ जुबां के सिरे पे ही ठहरने होंगे

मैं जो गिर जाऊं तो मुझे आप ही उठना होगा
खुद दवाई लगानी होगी , जो छिला घुटना होगा

वो नखरे मेरे , शिकायतें सब , कुछ बोलती नहीं
ये दुनिया कहाँ तेरे जैसी है , जो मुझे तोलती नहीं

अब कहाँ तेरी बाहों का झूलना होगा
लोग कहते हैं की अब घर को भूलना होगा

बाहें खोल देता है , जो थक के आओगे
वो घर ही भुलाओगे , तो कहाँ जाओगे !

ये फर्नीचर ,दीवार ,दरवाज़े,आचार का मर्तबान
सब बोलने लगे हैं , तेरी ही जुबान  !

जन्नत बनाई ,पर वहाँ रहने वाला बाशिंदा ही नहीं
शहर में लगता है कोई अब ज़िंदा ही नहीं

बहुत आवाज़ें दी थीं , कितना चिल्लाई थी
पहली  बार तूने ऐसी की रुस्वाई थी

मेरा खुदा नहीं है अब , कोई डर भी नहीं है साथ
नशेमन का नसीब , लो किस्मत के है हाथ
(नशेमन- the nest )

अब मेरे सर से ले कर पाँव तक, हर जगह तू है
सर का आसमान, तले  ज़मीन, ये  फ़िज़ा तू है

मुझे पता है , 'उसके' अद्ल  की कमर हुई है टूटी
दिल के बहलाने को एक राह थी, वो भी निकली झूठी
(अद्ल- justice , equity , fairness )

कोई पूछे तो कह देती हूँ , 'ठीक हूँ मैं '
खिल्क़त के सवालों में कौन गँवाए समय  !
(खिल्क़त- people, the world , दुनिया के लोग , सृष्टि )

सब न-महसूस कर देती  हूँ ,खला ,दर्द ,फासुर्दा मिन्नतें
जाने कहाँ से आती हैं ऐसी हिम्मतें

तुझसे जुड़ी लकीर ढूंढ़ती रहती हूँ अपने हाथ
शायद तू आए, तुझसे वाबस्ता किसी ज़िक्र के साथ

अब क्या करूँ ! सब हार के ज़ाफ़रीन हो गई हूँ
देख ! तुझसे अल्हैदा हो कर , मैं कितनी ज़हीन हो गई हूँ !
(ज़ाफ़रीन- victorious )

Saturday, 20 May 2017

एक आसान सी ज़िन्दगी

एक आसान सी ज़िन्दगी जैसे हासिल ही है
मुसलसल सी एक तलाश की मंज़िल ही नहीं

बना कर जिस्म मिट्टी का , फ़ौलाद भरा सीने में
मेरी उस माँ की नेमतों के तू काबिल ही नहीं

नापी कितनी चौखटें , झुकाया सर को सजदे में
न गाया हो तेरा किस्सा , ऐसी महफ़िल ही नहीं

न जुबां पे आता है, न दिल में समाता है
बराबर सख़्त है ये डर , सिर्फ संगदिल ही नहीं

धौंकनी सी चलती है , दिन रात सीने में
इस मामले में चलो माना ! ,मुझसा बुज़दिल ही नहीं

ज़रा धीरे चल ज़िन्दगी , सँभलने का तो मौका दे
नहीं ये खुशदिली की राह , सफ़र कामिल ही नहीं
(कामिल - complete , perfect )

ख़ुदी को बना के ख़ुदा , ख़ुद  का ही सहारा है
सबक़ आसान था , पर मुझसा कोई जाहिल ही नहीं 

Friday, 17 February 2017

तेरी नज़र की कलम


तेरी नज़र की कलम अब वो नज़्म नहीं लिखती

जिसके हर मोड़-मिसरे पे कभी मेरा ठिकाना था


सच है , कागज़ की कश्ती की उम्र बहुत नहीं होती

पर दिल के सुकून का ये मश्ग़ला पुश्तों पुराना था


सफ़ेद चादर की दीवारों में मैंने खुद को खोया था

मेरी कलम में उतर आएगा ये जो भी फ़साना था


इस जहाँ से उस जहाँ को जोड़ती हैं बस साँसें

जो साँसों तक सिमटे , क्या इश्क़ फरमाना था  ?


अभी तू खुश हो जा कातिल , चेहरे को रौनक दे !

तेरे इस बेकदर कहर का भी अंजाम आना था


बहुत मिल जाएंगे मुझे तुझसे , तुझे मुझसे लेकिन

मुझे तुझसा , यूँ मिल के भूलने का , हुनर कमाना था


नहीं कोई कहानी है , तेरे मेरे हिस्से आई

पर लगता है की जैसे कोई एक पूरा ज़माना था  


मुझे यादों से यूँ तो कोई ज़्यादती नहीं तकलीफ

पर जैसे जान पे बनी थी, इनका आ कर न जाना था  ||


-अनुष्का 

Friday, 30 December 2016

नया साल




एक ग़ाफ़िल सा साल था
चला गया , जा रहा है
पर , ख़्वाबीदा मेरी हसरत
फिर अगले साल को
नया ख़्वाब आ रहा है
❤️

(ग़ाफ़िल- insensible
ख़्वाबीदा - lost in dreams , latent )

Tuesday, 6 September 2016

मन




सारा बोझ सर से उतार के
रख देने की ख़्वाहिश ने
फिर सर उठाया है
मन फिर से फुसफुसाया
और आकांशाएं जवान होने लगीं ...
काश !
सुबह को रंगीन किरणें घर आएं
एक कोरा अखबार हो
और झूले की मीठी नमकीन पींगें
ओर-छोर ऐसे ही झूले मन
और झूले से गिर जाने के अलावा
कोई और डर न डरा पाए
हल्की हल्की साँस आए
फिर तुलसी अदरक की चाय
और दोपहरी में पीली दाल -चावल
एक गुदगुदाती किताब के पन्ने
तो कभी कोई तुमसी नज़्म 
जो बिन बोले मन सहला जाए
शाम में तुम आओ
तो तुम्हें मदमस्त पढ़ सुनाती
कुछ कविता का रस होता
कुछ तुमको गुनगुनाती
..सुस्ताती अँगड़ाती शरीर की हड्डियाँ
माँ की गोद सा बिछौना
और पिता की पनाह सी छत
बस इतना मिल जाए
जैसे बरसों बाद तन गंगा नहाए..
ज़मीन पे टिके रहने की ख़्वाहिश है
बाहर तो एक बड़ी नुमाइश है
जहाँ सब बिकता है
सपने हकीकत किसी के दिन ,
किसी की रात
यहाँ तक की बिक जाते है
कभी कभी खुद हालात !
बाकी सब ढकोसला है
सुना है , ऊँची इमारतों का मन खोकला है
सब मन की माया
मन ने ही बना डाला संसार
सब मन के आगे पस्त हुए
पर मन ने ही बुना है व्यापार

ख़ैर !
हर छुट्टी के दिन अपने सपनों को
पानी देते रहते हैं
मन का वृक्ष सूख न जाए
मैं ज़िंदा हूँ ! कोई तो याद दिलाए
एक उम्मीद की नैय्या पार लग जाए
कैसे भी करके ...
ये  सनीचर उतर जाए

कल फिर दौड़ में बने रहने को
एक ग़ैर-ज़रूरी जंग होगी
ज़रुरत बुरी चीज़ है !!

ये सुन मेरी आत्मा मुझ-ही  से तंग होगी

Saturday, 27 August 2016

#दाना मांझी


पंजर के भीतर क़ैद ह्रदय में , जो एक "हाँजी" होता
भीड़ अंधी-गूंगी न होती , हर दरिया का माँझी होता

वातानुकूलित कमरे से निकल ,कोई सुख - दुःख का सांझी होता
न कोई कालाहांडी होती , न कोई दाना मांझी होता

Thursday, 9 June 2016

नुख्ताचीन









नुख्ताचीन हर नज़र है 
यहाँ खुश रहने को क्या नया हो ! 
ख़्याल अपने बारे में ही अच्छा न हो
तो ज़िन्दगी में क्या बचा हो !! 

Monday, 6 June 2016

होंठों पे जादू , चाहे दिल में तूफ़ान

होंठों पे जादू , चाहे दिल में तूफ़ान
क्योंकि आप अपना मरहम है
भाईसाब ! यहाँ की यही रीत
गोया हम में ही कुछ कम है

है सब पानी , बहता बड़ी तेज़
मेरी ही चाल मद्धम है
उस पार हैं कबके टाप गए सब
क्यों रुका मेरा ही कदम है

दो घड़ी जो रुक कर सुन ले बस
मेहबूब का बड़ा करम है
अब हवा , मुरादें , पंछी हैं कहाँ
ये तो बस कल के भरम हैं

मेरा हाथ थाम के चलदे बस
ये इतना कहाँ तूझमें दम है
गिर कर ही चलना सिखाती है
ज़िन्दगी का हंसीं सितम है

मुझे फिर भी यूँ रह जाने पे नाज़
बस आँख ज़रा सी नम हैं
तकमील परस्ती में क्या उम्र गंवाएं !
ज़िन्दगी ये आवारा सनम हैं

है मेरा अपना ये साया तब तक
जब तक बस हम में हम हैं
कोई और बनने में गँवा दिया
 तो बेकार गया ये जनम है






तकमील - perfection / perfectionist 

Friday, 13 May 2016

जो होता कोई वक़्त

जो होता कोई वक़्त तो गुज़र भी जाता
ये यादों का समुन्दर है , लहर लौट ही आती है

न तो इश्क़ ही कहलाया , न कोई वफ़ा का नाम
जैसे कोई सराब है और यूँ ही लुभाती है

चश्म का दरिया हो , या हो जुबां का आबिलह
बड़ी बेदर्द ये किस्मत है , हमेशा रंग दिखती है

मैं भी फ़लक के आईने में , बसता कोई चाँद होती !!
बारान के फ़स्ल में घुली ,ख़ाक की खुशबू ही भाती है

आँख से सीने में , फिर सीने से रग में उतरे
ये ख़्वाब बेहया हैं, आशुफ़्ता मेरी हस्ती है

आज़ार-ए -जान हो जाए , दोस्ती है या छलावे हैं
अब्लहि ही अब तो अक्सर , मुझे मुझसे मिलाती है





आबिलह - blister
बारान-rain
फ़स्ल-season
आज़ार-ए -जान - torment of life
अब्लहि - quality of simpleton, stupidity

Wednesday, 4 May 2016

ये भक्ति है

मंदिर में जा कर
एक  सुकून मिला ,
पत्थर को सजा कर...
उतार के सब लकीरें
अपने माथे से,
उसके पैरों में रख आए हैं।
देखो ! हमने "फ़र्ज़" निभाए हैं !
उसको नींद जगाने को,
ज़ोर से एक घंटे की मूँछ भी खींची
फिर हिला के अपने हाथ
सब पाप-मैल वहीँ झाड़ दिया
हाथ हलके किये ,
आखिर  नए "कर्मों" को भी जगह चाहिए !
अपना माथा लाल रंगा
बाहर बैठे कुछ टेढ़ी लकीरों वाले हाथों में
कुछ सीधी लकीरों वाले हाथों ने
परोपकार बरसाया !
बस अब सब साफ़ है पाक है
ये भक्ति है , क्या समझे मज़ाक है ??

Saturday, 30 April 2016

न कोई रिश्ता न कोई हक़ रहा



न कोई रिश्ता न कोई हक़ रहा
पर मेरे वजूद की तरह वो बेशक रहा
बसा करता है सीने की परतों में कहीं
चलो ये दर्द ही इनाम-उल-हक़ रहा

ऐशो-आराम की एक हांडी में
दाल-भात सा है दहक रहा
है एक सवाल ये मुक्कम्मल सा
क्यों मट्टी में ही मर्ज सिसक रहा ?

नहीं कोई सुराख फिर भी दीदार को
उठा के एढ़ियां जो मैं उचक रहा
बेकार बारहां सा मश्क़ है लेकिन
जो छोड़ दूँ तो तुझमें-मुझमें क्या फ़र्क रहा !

आसाइश में मेरे बाजू में सुनो
एक हुजूम दोस्त-रिश्तों का चहक रहा
आमंद-ओ-रफ़्त; इक पुराना सिलसिला
मन यूँ ही वहशत में बहक रहा !

है तुझसे कैसा यकीन का रिश्ता !
किसी और पे इनायत से मुझको रश्क़ रहा
कितनी ख्वाहिशें हैं ! पूछो उससे  
फूल-माला बन गले में जो कसक रहा

तेरे बिना मैं कुछ नहीं माना
पर कहाँ मेरे बिन तू भी महक रहा !
ख़ुदा ; इलाही या आसमां का ख़्वाब
ये कुछ नहीं  , तेरा नाम अब इसक रहा।


(इनाम-उल-हक़- gift of the truth
आसाइश - rest , comfort
आमंद-ओ-रफ़्त - coming and going
इसक - इश्क़ )