Wednesday, 20 May 2015

तुम अब भी वही हो



जब भी तुम्हें देखती हूँ
एहसास होता है 
तुम अब भी वही हो ...

मासूम सी आँखें 
शरारत भरी मुस्कान 
वो लाल जैकेट का खड़ा कॉलर 
और, बालों का वही स्टाइल 
वही बेकूफ सा फूहड़ लड़का ..

पर अफ़सोस है 
की ज़िन्दगी अपनी यूँ ही बिताओगे 
काले चश्मे से ही धूप छिपाओगे 
मुझसा मुक़द्दस मुख़लिस नहीं पाओगे 
एक दिन ये समझ जाओगे 

तुम आज भी उतने ही जाहिल हो 
रिश्तों के ख़लूस से महरूम 
बाज़दफा फिर भी लगता था  
अलाहदा है सबसे तुम्हारा ज़िक्र 
शायद न समझ पाई तुमको ; थी फ़िक्र 


पर आज.....

आओ तुम्हें माथे पे बोसा  दे 
विदा कर दूँ इस बवंडर के परे 
सुनो , तुममें-मुझमें बस ये ही एक-सा है 
मैं आज भी वही हूँ 
और तुम अब भी वही हो 

Monday, 18 May 2015

कुछ तुम , कुछ मैं !!



कुछ तुम कह लेना 
कुछ मैं सुन लूँगी 
एक ग़ज़ल सी , स्याही में घुल कर 
किताबों में गुनगुनाउँगी 
और उधड़े ख़्वाब बुन जाऊँगी  

कुछ तुम मेरे पास आओगे
कुछ मैं पास आऊँगी
फिर तारीक़ बंद कमरों में
जाने कितनी रातें जला कर
रोशिनी को पी जाऊँगी  

कुछ को समझौतों का नाम देंगे
कुछ को कह देंगे वक़्त की ज़रूरत
फिर दोस्ती के वरक में
कुछ ज़्यादा को लपेट कर
मन के टूटे कनस्तर में रख भूल जाऊँगी  

कुछ तुम तवाज़ुन बरतना
कुछ मैं  कदम जमाऊँगी
बारिशों के मौसम में
एक बार जो पौधा लगाया था
उसी के हरे खून में बेतुक रंगी जाऊंगी  




Saturday, 9 May 2015

उस घर में


कुछ धूल में लिपटे फ्रेम 
और फ्रेम में जड़ी काई 
एक दीवार जिसके सहारे 
सिसकियों में रात बिताई 
बस ये ही कुछ याद है 
जो छोड़ आई हूँ मैं 
अपने पीछे 
उस घर में

वो छज्जा जहाँ बार बार 
घर बनाता था कबूतर का जोड़ा 
हर बार मैं झुँझलाई 
हर बार तिनकों को तोड़ा 
बचा खुचा समेट कर अपना 
उनका घर बसा आई हूँ मैं 
अपने पीछे 
उस घर में 

कुछ टूटने का डर कभी 
कोई अजल-गिरिफ़्ता चिंता 
वक़्त के पुर्ज़े लटकाने को 
की दीवारों पे चोट चुनिंदा 
उनके निशाँ न मिटा पाई 
पर वो सुराख़ भर आई हूँ मैं 
अपने पीछे 
उस घर में 

रस्सी से बाँधती थी 
बरामदे में पुरवाई 
तौलिये में समेट लेती 
ज़ुल्फों की अल्हड़ अंगड़ाई 
जिनमें संसार बाँधा था 
वो गिरहें खोल आई हूँ मैं 
अपने पीछे 
उस घर में 

एक झरोखा उस कमरे का 
पहली किरण जिसको चूमा करती थी 
एक गिलहरी लुका-छुपी में 
नयन मटकाए झूमा करती थी 
हटा कर गत्ते-कागज़ की आड़ 
उसको भी आज़ाद कर आई हूँ मैं 
अपने पीछे 
उस घर में 





मेरे सपने

मेरे सपने 
नहीं हैं सरसों के पीले खेतों के 
न बाज़ार में बिकते भेदों के 
ये तो बस हरियाली के दीवाने हैं 

मेरे सपने 
न ऊँची कनक मुंडेरों के 
न कागज़ के टुकड़ों के डेरों के 
बस रिश्तों की आँच पे पकी मिट्टी के अफ़साने हैं 

मेरे सपने 
आसमान पे किस्मत के तारे नहीं 
राह देखते मूक किनारे नहीं 
ज़मीन के सीने में बसी खुशबू के तराने हैं 

मेरे सपने 
नहीं हैं काजल बिंदी गहने चूड़ियाँ 
मन को जकड़े छलिया बेड़ियाँ 
ये चेहरे पे रैशन मुस्कान के  पैमाने हैं 

मेरे सपने 
न तुमसे जुडी यादों का पुलिंदा कोई 
न प्रेम नगर का बाशिंदा कोई 
अनकही कहानी और पिया के बंधन बचकाने हैं 

मेरे सपने 
इश्क़ नहीं कोई सोचा समझा 
न फटी पतंग का उलझा मांझा 
भटक कर खुद को पाने के सफ़र सुहाने हैं  

Monday, 4 May 2015

और ही रंग था ...

और ही रंग था उस दौर का क्या हाल बताएँ 
जब हम आँख तले सपनों का बाज़ार सजाते थे 

रूह जुबां पे बसती थी , चोट आँखों में हंसती थी 
और खेल को बस हम ज़ख्मों का ज़िम्मेदार बताते थे

जब क़द्र थी भूक-प्यास की , मिजाज़ की , एहसास की 
जब आसमां से टपकते पानी को हम प्यास बताते थे 

सफ़ेद कागज़ पे लिखते थे शौक़ , ख़्वाब , नज़ाकत 
किसी के बहते आँसू हमको बेज़ार सताते थे 

राहों पे लिखी जाती थी सफर की कोई कहानी , 
किसी के लौट आने को , वक़्त का दिया जलाते थे 

मुझे वो "मैं " न मिले पर "मैं " के रंग पक्के हैं 
खोखले उसूलों की आज क्या ,कल भी हम ख़ाक उड़ाते थे 

Saturday, 25 April 2015

ek khatam hua sa kissa



ek khatam hua sa kissa lagta tha koi pehle
wo hissa jo ab bhi mujhme na marta hai

na kabhi socha tha iss had tak kulbulaega
ye nasoor jaate jaate bhi kyu thaharta hai

tum kyu ab bhi sulagte rehte ho bheetar kahin
na aag ka wajood hai na sukoon milta hai

nayi koi raah mud jaae koi parinda toh kya
uss shaakh ka toota sapna na pighalta hai

uss baat pe tum galat iss baat pe mera dosh ! 
isme lutaya pal aaj mere muh ko silta hai

chun ke rakh lenge hum bhi bojhil saanso me lipta dum
ye dum na dum leta hai na nikalta hai 


Saturday, 18 April 2015

ये वो ही दिन हैं फिर



ये वो ही दिन हैं फिर
जब धूप थोड़ी कम सुलगती थी
हवा ज़रा तेज़ चलती थी
किसी को आँचलों की नरमी
चेहरों की सिलवटों पे पड़ी
एक कराह सी लगती है
ये वो ही दिन हैं फिर


ये वो ही दिन हैं फिर
की जब हम बौराए से
मन से हारे , सिर झुकाए
दिल की ज़िदों को
कन्धों पे बिठाए चले थे
और पाँव की ज़ंजीर पिघलती है
ये वो ही दिन हैं फिर


ये वो ही दिन हैं फिर
जब घी रोटी पे जम जाता था
जैसे चाँद बादलों पे ग़श खाता था
बारिश में कपड़े-लत्ते भीतर सुखाए जाते थे
और छाते का दर्द ना कोई समझ पाता था
बीमार-हाल धड़कन है ,वैसे ही मचलती है
ये वो ही दिन हैं फिर !

Friday, 13 March 2015

ये आवारगी का आलम



ये आवारगी का आलम , इसका भी इन्साफ करिये
करके खुदी (ego)से आज़ाद , खुद में खुद को भरिये
ये खरीद - फ़रोख़्त  की दुनिया है , इससे क्या ग़िला !
पर कैसे मोल - भाव की रिवायत से किनारा करिये ?!?


बाज़ार में बिकने वालों की क्या चाह रखना ! 
हो अपनी जेब पे भरोसा तो क्यूँ  "आह" रखना
वो , जो इस तिजारत की औक़ात से परे हैं
उनके पाले में खड़े रहने की औक़ात रखिये !


है आदिल सा , सहमा सा एक ख़्वाब मेरा
इस छज्जे के किनारे जाने कितनों का बसेरा
देके दुनिया को अपने कान , दिल दिया है ख्वाबों को
तो क्यूँ  रोज़ किसी के शिकवे पे बेवज़ह मरिये ?!?



पहले ही बहुत सी सरहदों के जाल हैं यहाँ
नहीं कोई सदा रहता ; बस कुछ मिट्टी के निशां
हाथों की क़ुव्वत से रंगे जाते हैं किस्मत के सफ़्हे
कहकशां के सितारों की चाल से फिर क्यूँ डरिये ! 


आज मैं हूँ ,तो महफ़िल है , खुशबू  रंग  मंज़िल है
न हो "गुलज़ार" सी कुव्वत ; स्याही कागज़ के काबिल है
कल कोई और , परसों होगा  कोई और
शमा गुलज़ार रखने को मालिक के हज़ार ज़रिये



Wednesday, 11 March 2015

न तुम्हे मेरी ज़रूरत




न तुम्हे मेरी ज़रूरत , न मुझे तेरा गुमाँ है
यूँ ही मन के धागे बांधे फ़िर रहा इन्सां है

रवादारी 'औ इनायत की न बरसात अब करो तुम
है नौ-सिखिया ये मन मेरा, बड़ी शातिर तेरी ज़ुबाँ है

न किसी को दोष देने की ख्वाहिश न इज़्ज़त की है गुंजाइश
थे बनते दोस्त कल तक मेरे आज फ्रेम-जड़े मेहमां हैं

छोड़ा मैंने हाथ किसी का, किसी ने छोड़ दिया मेरा
आनी-जानी है ये दुनिया , सबका एक निगहबां है

अपनी ज़िंदादिली और सख़्त-जान के क़सीदे पढ़े हैं मैंने
पर न होगा ज़ाहिर कि मौसमो की मार से आरा ये मकाँ है

किसी के शौक़ का बाजार पूरी दुनिया में लगता है
महफ़िल है मुंसिफ तब तक , जब तक रगों में खून जवां है

पतझड़ में करूँ मैं ख़्वाहिश , रूख पे बहार की
और फिर अफ़सुर्दा (उदास) की मुझको इम्तहानों की इन्तेहां है

जाने कितनी बार फेंका है मैंने आसमानों की तरफ इनको
नामुराद सी दुआएँ न कबूल होती हैं , न मिटता इनका निशाँ है

ये उल्फत नहीं है शायद, गिरहों की लम्बी लड़ी है
सुलझाते उम्र निकलेगी , ये मज़ीद (furthur, more) लम्बा कारवां है

आशुफ़्ता (घबराए हुए ) हूँ की कोई तो दिखे असबाब (कारण , वजह ) इस करम का,
शायद यहाँ भी कोई मेरी ज़र - ज़मीन से आश्ना (परिचित) है

नहीं कुछ कोरा बचा है , न दो लफ्ज़ो में सिमट पाए
मेरी ज़िन्दगी के सफ़्हे हैं रंगे , ये लम्बी दास्तां है

Tuesday, 10 March 2015

जाने कहाँ है वो मुकाम




जाने कहाँ है वो मुकाम के जहाँ पहुँच कर
दुनिया के उसूलों के काबिल कह खुद को बहलाते हैं

कभी एक ख़ाक में जा घुलता है पानी का कोई छींटा
ऐसे धार में शामिल हो खुद को सभ्य हम कहलाते हैं

है लड़ती हद से अनहद से हर रोज़ ही खुदी मेरी 
कि यहाँ ये पामाल करके सपने , कुछ तो पाते हैं

सिर्फ चेहरे का नूर ही नहीं किये देता है अँधा
तिजारतों में बिकते ईमान , करवटें बदलते इरादे हैं


हैं जीते वही बेशक के जो हैं आज़ाद इन चोंचलों से
पर रहे याद की बिना मरे नहीं ये जन्नत कभी पाते हैं

Friday, 27 February 2015

Aadhi Raat




Aadhi  raat guzri hai
Aadha din baaki hai
Reshamo ki deewarein
Sar pe chatt khaaki hai

chaand ko mehmaan bana ,
shab bhar ko maangi raunakein..
jo hai behis , ehsaas se aari..
yu usko raat siyaah ki hai..

Kuch anchui takdeerein
Aur besudh si yaadein hain
Kabhi aks ka dhundalka
Kabhi yaad hi tabaah ki hai

Kyu main hi hu mutasir
Taariq (dark/darkness) raahon me dhundti chirag..!
Kahani kuch sapne, 
aur ek gunaah ki hai

Monday, 23 February 2015

Sleepless saturday



Jab koi zubaa na asar paae
Hum dua ki zubaa par utar aae
Chalo ye bhi aazmaate hain
Ab kal purzo ka chod ke daman
Vishwaas pe daanv lagate hain

Wednesday, 18 February 2015

A new me !! With love !

Wenever i leAve places i feel An intense urge to go back nd once again see wot is alteady seen ! Hear whAt is already heard , smell what is familiar ! A kind of string i feel attached to such places ... Places those are less luxurious , places those are normal, usual, ordinary , sober, level-headed... Places where people are plainspoken , familiar , pure , rude at times but honest and as good as one's words !
This string keeps me hook up and as and when i leave places and move to a new ones this cord seems to be stretching to an immeasurable extent , Till all the such new places...
Some part of me still settled in the old places , interacts with the new one and thus all the old and new me mingle and makes a new me ! Which is somehow more exotic , more humane, more grateful and beholden  towards that mighty God and more enlighten and acquaint !

- for you - jaipur , kashmir and lucknow
With love !